Dr. Ajit

Dr. Ajit

सब कुछ आधा-अधूरा। न पूरा कवि, न पूरा लेखक। अधूरेपन से प्यार है। मन की दासता की हानियों से अवगत होने के बावजूद मन की सुनने से कभी बाज़ नहीं आया। मन को पढ़ा, मन का विज्ञान भी पढ़ा। मन को पढ़ने में जितना निपुण रहा, उतना ही अनिपुण भी।

जीवन में असंगत चीज़ों ने मुझे लिखने की दिशा में आगे बढ़ाया, ठीक वैसे ही जैसे कोई लहर किसी नौसिखिए तैराक को डूबने से बचने का एक अवसर देती है। डूबने से तो बच गया, मगर स्वयं को तैराकी से नहीं बचा पाया।

असल जीवन में जितनी चुप्पियाँ और ख़ामोशियाँ थीं, उनके दशमांश को शब्दों का आकार देकर मन के मचान पर टाँग दिया है। कुछ लोग इन्हें दिशासूचक समझ लेते हैं, यही मेरी सफलता है और यही मेरा भ्रम।