कमल जीत चौधरी जब यह लिखते हैं— ”जिस कविताई (कला) में तस्दीक, शिना.ख्त, प्रेम और प्रतिरोध करने की क्षमता नहीं है, वह किसी काम की नहीं है” तो उनका सही परिचय मिल जाता है। बाकी वे जम्मू-कश्मीर के साम्बा जिले के एक सीमावर्ती गाँव-काली बड़ी में रहते हैं। 2007 में लिखना शुरू किया। अब तक पचास से अधिक प्रिंट पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ, आलेख, अनुवाद और कथाएँ प्रकाशित हैं। इनका लेखन अनेक ऑनलाइन मंचों पर भी लाइव है। इनके तीन कविता संग्रह- ‘हिन्दी का नमक’ (2016), ‘समकाल की आवाज़ : चयनित कविताएँ’ (2022) और ‘दुनिया का अंतिम घोषणापत्र’ (2022) प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा इनके संपादन में जम्मू-कश्मीर की प्रतिनिधि हिन्दी कविता का एक संकलन- ‘मुझे आई डी. कार्ड दिलाओ’ (2018) भी छपा है। ‘इस सदी के सामने’ (स. राजेश जोशी, आरती) ‘कँटीले तार की तरह’ (स. संजय कुंदन), ‘आठवाँ युवा द्वादश’ (स. निरंजन श्रोत्रिय), ‘स्वर एकादश’ (स. राज्यबर्धन), ‘बच्चों से अदब से बात करो’ (स. अजय कुमार पाण्डेय), ‘तिमिर में ज्योति जैसे’ (स. अरुण होता) आदि महत्वपूर्ण संकलनों में कविताएँ संकलित हुई हैं। इन्हें ‘अनुनाद सम्मान’ और ‘पाखी शब्द साधक सम्मान’ मिला है। इनकी कविताओं का उड़िया, बंगला, मराठी और अंग्रेज़ी में अनुवाद और प्रकाशन हुआ है।
संप्रति : जम्मू-कश्मीर उच्च शिक्षा विभाग में प्राध्यापक हैं।
