सिद्धेश्वर मैदान और पहाड़ को जोड़ने वाले कवि हैं। उनकी कविता में नदियों का बहता जल है। वन और वनस्पतियाँ, सूर्योदय और सूर्यास्त है। ऋतुएँ हैं। इस जुड़ाव में जहाँ स्मृतियाँ फूल की तरह खिलती हैं, वहीं वर्तमान की खड़ी चढ़ाई श्लथ कर देती है। इस यात्रा का अंतहीन होना ही इसे त्रासद बनाता है। रौशनी की तलाश में कवि ऐसी यात्राएँ करते रहे हैं।
सिद्धेश्वर का समय सच और झूठ के सम्मिलन का है। झूठ के भंवर में सच के डूबते-उपराते तिनके को उनकी कविता पा लेना चाहती है। दृश्यों में अदृश्य ही उनका लक्ष्य है। स्मृतियाँ उनकी कविता का तलघर हैं। पर वे छीज रही हैं। उन्हें पालतू चूहे अपने नुकीले दाँतों से कुतर रहे हैं। सुंदर की राख गिर रही है। स्थानापन्न कुरूप है। सबकुछ अधूरा है। कवि को अपने निरर्थक होने का एहसास बराबर बना रहता है।
अपनी भाषा से बेगानापन आधुनिक भारत की देन है। राष्ट्रभाषा की आकांक्षा ने मातृभाषाओं का गला घोंट दिया। उसकी घुटी-घुटी आवाज़ें जब-तब कविता में सुनाई पड़ती हैं। अपने लिखे से अजनबियत महसूस होती है। सिद्धेश्वर की ‘भोजपुरी’ ऐसी ही भाषाओं का विलाप है। और, इसलिए वह दूसरी भाषाओं के अकेलेपन को भी गाने बैठ जाती है हिन्दी में। एक भरथरी गायक है जिसकी आवाज़ सारंगी की ही तरह अब सुनाई नहीं पड़ती।
सिद्धेश्वर का यह दूसरा ही संग्रह है, पर इसकी सांद्रता बताती है कि समय ने उन्हें बहुत मथा है। पूर्वज कवियों से यह समृद्ध है और इसका वितान विस्तृत है। समय की समझ और कविता की पहुँच के लिए इस संग्रह को याद रखा जाएगा।
— अरुण देव
