Jyotsna Mishra

Jyotsna Mishra

डॉ. ज्योत्स्ना के भीतर हमेशा से एक क़िस्सागो रहा है, जब वे कविताएँ लिखती हैं तब भी, जब वे मंच पर होती हैं तब भी और जब से कहानियाँ लिखना आरंभ किया है वे अपने कहन को और अधिक तराशती आई हैं। उनके जीवन अनुभवों में जब व्यक्ति समष्टि से मिलता है तो वहाँ कथा-.फलक एक विराट रूप ले लेता है। इस संकलन की पहली ही कहानी ‘खोना भी एक क्रिया है’ इस कथा-संकलन का केंद्रीय दर्शन है।

डॉ. ज्योत्स्ना की मनोविज्ञान पर फॉर्सेप-सी महीन पकड़ कहानियों को बहुस्तरीय बनाती है और पात्रों को गहराई देती है, मुझे वे कहानियाँ पसंद हैं, जिनमें पॉलिटिकल करेक्टनेस का थोपा हुआ आग्रह न हो, बल्कि कहानी जीवन की एक महीन स्लाइस हो। इस संकलन की कहानियाँ इस मापदंड पर खरी तो हैं हीं इनमें परिवेश की ध्वन्यात्मकता की गुनगुन इन्हें अतिरिक्त पात्रता देती है इनके विशिष्ट होने को।

— मनीषा कुलश्रेष्ठ