Lakshmi Ghosh

Lakshmi Ghosh

शिक्षिका हूँ, विज्ञान पढ़ाती हूँ। रसायन शास्त्र पढ़ा, मगर मन कहानियों और कविताओं में बसा रहा। कभी चित्र बनाए, कभी सिनेमा में खोई रही। ज़िंदगी तेज़ कदम अच्छी नहीं लगती, मगर कमोबेश धीमी भी न रही। इसी गुज़र में अनुभूत हुए को जैसा लिखा जा सका, लिख दिया।

क्या कभी कुछ भी, साँस जितना ज़रूरी हो सकता है? मगर ज़िंदगी जिस शक्ल में सबको मिलती है, उनको कविता कहीं दिलासा देती है, कहानी कोई भरोसा। ये ठहरे पानी पर तैरते शाख़ से टूटे पत्ते हैं। ये धीमी लहरों पर डूबते-उभरते रहते हैं। यही ज़िंदगी की ख़ूबसूरती है।