रेवाड़ी (हरियाणा) के भाड़ावास गाँव में जन्मे रत्नकुमार सांभरिया, 46 वर्षों से राजस्थान में निवास कर रहे हैं। अब तक उनके पाँच कहानी संग्रह, नौ नाटक— वीमा, उजास, भभूल्या, वीरवर वीरा पासी, क्रान्तिजनक शहीद माता दीन हेला, झलकारी बाई की .कुर्बानी, शहीद बीरबल सिंह, आज़ादी का दीवाना : छैलाराम सरगरा, शहीद छात्रा कालीबाई भील, समाज की नाक (एकांकी संग्रह), मुंशी प्रेमचंद और दलित समाज (आलोचना पुस्तक), दो उपन्यास— साँप और नटनी प्रकाशित हैं।
सांभरिया की लघुकथाएँ, नाटक, कहानी एवं उपन्यास देश के लगभग 41 विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। अब तक लगभग चार दर्जन शोधार्थी उनके साहित्य पर एम.फिल. एवं पीएच.डी. कर चुके हैं। उनकी रचनाएँ अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, उड़िया आदि भाषाओं में अनूदित हैं। ‘Thunderstorm Dalit Stories’, U.K. London and Company Hachette India द्वारा प्रकाशित है। ‘मैं जीती’ कहानी पर टेलीफ़िल्म का निर्माण हुआ है।
नवज्योति कथा सम्मान, राष्ट्रीय सहारा कहानी प्रतियोगिता का पुरस्कार, कथादेश अखिल भारतीय हिन्दी कहानी प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार, राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक पुरस्कार, हरियाणा गौरव सम्मान, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा का सुब्रह्मण्य भारती साहित्य पुरस्कार एवं राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च मीरां पुरस्कार (‘साँप’ उपन्यास) सहित विभिन्न सम्मान-पुरस्कार रत्नकुमार सांभरिया को प्राप्त हैं।
राजस्थान सूचना एवं जनसम्पर्क सेवा के उप निदेशक (प्रशासन) पद से सेवानिवृत्त हैं।
