राजस्थानी भासा रा युवा कवि श्री सत्येंद्र चारण रौ जलम 10 अगस्त 1998 नै नागौर जिलै रै अेक छोटैक गांव झोरड़ा मांय स्व. श्री कैलाशदान जी चारण अर उणांरी जोड़ायत श्रीमती मैना कंवर रै आंगणै हुवौ। आप बी.एससी., बी.एड. अर एम.ए तांई भणिज्योड़ा है अर अबार न्याय विभाग राजस्थान में लिपिक ग्रेड द्वितीय रै पद माथै कार्यरत है, साथै ही आकाशवाणी जोधपुर में उद्घोषक रै रूप में ई सेवा दैवे। परंपरागत साहित्य सेवी परिवार में जलम रै कारण साहित्य रा संस्कार आपनैं गुटकी में मिल्या। मायड़ भाषा रै पेटे श्रद्धा अर सनमान रा भाव आपरी रग-रग में बसै। श्री सत्येंद्र चारण राजस्थानी भासा में छंदबद्ध अर मुक्तछंद दोन्यूं शैलियां में कवितावां लिखण रै साथै ही परंपरागत डिंगल साहित्य में पण गहरी रुचि राखै। आप लारलै 6 बरसां सूं साहित्य सृजन में रत रैवता थकां कैई कवि सम्मेलनां में काव्यपाठ कर चुका है अर आपरी कवितावां आकासवाणी सूं ई लगौलग प्रसारित हूवती रैवै। श्री सत्येंद्र चारण री पैलड़ी पोथी ‘भींत भरोसै री’ में राजस्थानी माटी री सौरम, इण भासा री मिठास अर मरोड़ रै सागै ई देश अर दुनिया री पीड़ा आछी तरिया दैखण नै मिळै। आपरी कवितावां में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, जुद्ध रौ विरोध, परकत नै बचावण री हूंस अर मरुधर री संस्क्रति रै सागै लोक रंग री बानगी री बहुतायत है। ठैठ राजस्थानी सबदां रौ भंडार आपरी कवितावां में निगै आवै। म्हैं ‘भींत भरोसै री’ पोथी री सफळता री कामना करतौ थकौ साहित रै छैतर में आपरै ऊजळै भविस री मंगळ कामना करूँ।
– डॉ. महेन्द्र सिंह नरावत
