चायघर से… | कविता
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इस संग्रह में चाय पीने के बाद की स्फूर्ति और उमंग की रौ में सभ्यता-संस्कृति का विमर्श भी है, तो चाय के बहाने से सामाजिक यथार्थ की प्रतिपुष्टि भी। इस किताब की कविताएँ पढ़ कर पता लगता है कि ‘चय्याशों’ का अपना एक समानांतर लोकतंत्र भी है और सत्ता भी, जो इसी संसार में है और जो कुछ पलों मे ही, महज़ कुछ घूँटों के बाद ही हमारे सामने प्रत्यक्षरूपेण आ खड़ी होती है।
Author : Vivek Kumar Mishra
ISBN : 978-93-48290-42-7
Language : Hindi
Edition : First
Binding : Paperback
Pages : 116
Year : 2025
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