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‘उत्तरायण’: चैतन्य और बेचैन मन की गाथा

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धीरेंद्र प्रताप सिंह

‘उत्तरायण’ कथा-संग्रह में चैतन्य और बेचैन मन की गुत्थियाँ हैं। भाषा के ढहान सहित तमाम आसन्न संकटों की गाथा है। हिंदी भाषा के साहित्य और व्याकरण की रिक्तताओं और पतन की पीड़ा है। पीकदान के रूप में ढलती जा रही भाषा की उधड़ी परतें हैं तो दूसरी ओर उसी भाषा के धारदार तेवर भी हैं। भाषा और विचार को नियंत्रित करने वाली शक्ति-संरचनाओं और उनकी पहरेदारी की पड़ताल है। हिंदू धर्मशास्त्रों के मानवीय और ग्राह्य उद्धरण विशेषकर इस संग्रह के ‘मकर’ कहानी के सहायक तत्त्व हैं। ‘मकर’ के इतर इस संग्रह की पाँच और कहानियाँ अपने नवीन भाषिक शिल्प और समकालीन सामाजिक मनोविज्ञान की कई-कई परतों को उधेड़ देती है।

खगोलशास्त्र में वर्णित बारह राशियों के नामों पर शीर्षांकित इस संग्रह में छः कहानियाँ हैं। बकौल कथाकार भारतीय राशिनाम बेबीलोनी-यूनानी ज्योतिष से प्रेरित हैं। वस्तुत: इस संग्रह की कहानियाँ एक ठहरे हुए जल में हलचल की तरह या कहें कि कई जगह अचानक से हाथ की अंगुलियों में लगे नश्तर की तरह दिमाग़ को झनझना देने वाली हैं। कई जगह तो कहानियों की विषयवस्तु से अधिक कहानी से गुथी हुई टिप्पणियाँ विस्मित कर देती हैं। राशियों के नाम से जुड़ी हुई कहानियों में पहले उस संबंधित राशि की खगोलशास्त्रीय व्याख्या है, फिर उस व्याख्या के मर्म से जोड़ कर कहानी की जो विषयवस्तु बुनी गई, वह पढ़ना भी बड़ा रोचक है। प्रत्येक कहानी की शुरुआत में कहानी की राशि से जुड़े हुए चित्र भी प्रदर्शित हैं। संबंधित राशियों के चित्रों से उन राशियों के चरित्र को भी समझने में मदद मिलती है।

इस संग्रह की कहानियों को भारत की सांस्कृतिक और भाषाई चेतना के आधार पर देखें तो उनमें हिंदू धर्म और तात्समिक हिंदी का आयतन काफ़ी बड़ा है। जैसे कि ‘मकर’ कहानी के प्रत्येक खंड के आरम्भ में वर्णित गीता के श्लोक और पौराणिक देवी-देवताओं से जुड़े मिथकीय आख्यान वर्णित हैं। यद्यपि कि वर्णित वह श्लोक और आख्यान कहीं भी उन्माद या उग्रता को बढ़ावा देने वाले नहीं, बल्कि भारतीय मूल्यों जैसे न्याय और अन्याय के द्वंद्व से उपजे सहज मानवीय बोध की स्थापना में सहायक के तौर पर ही हैं। मसलन निराला की सार्वकालिक रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ में जिस तरह पौराणिक आख्यानों और प्रतीकों को मानवीय मूल्यों और जनपक्ष की तकनीक के रूप में प्रयुक्त किया गया है, कुछ उसी तरह की कला इस कहानी की भी है।

हिंदी भाषा के स्थापत्य, उसमें प्रयुक्त शब्दों की व्याकरणिक कसौटी और दर्शनशास्त्र के अनेक शब्दालियों पर जैसी जोर आजमाइश इस कहानी में है, संभवतः अन्यत्र दुर्लभ है। वैसे तो 296 पृष्ठों की इस कहानी संग्रह में छह राशियों के नाम पर केंद्रित कुल छः कहानियाँ हैं, लेकिन मकर कहानी ही अकेले 221 पृष्ठों की है। पहले बात ‘मकर’ कहानी की ही करते हैं। ‘मकर’ कहानी भारतीय संस्कृति की बुनियाद पर तमाम जटिल शब्दों, शब्दावलियों एवं दार्शनिक अवधारणाओं से बुनी हुई है। जटिल कहना दरअसल अदृश्य होते जा रहे शब्दों और अपनी सीमा का भी मामला है; क्योंकि इस कथा में प्रयुक्त जटिल शब्दावलियाँ या दार्शनिक अवधारणाऍं कल्पित नहीं भारतीय ज्ञान परंपरा का ही हिस्सा हैं। 

‘मकर’ कहानी में भाषा के दो प्रमुख अवयव शब्द और अर्थ की व्याख्या, उसके अंतर्संबंध एवं उनके स्वतंत्र आयामों पर विस्तार से बात हुई है। यह कहानी केवल भाषा, निडर पत्रकारिता या साहित्यिक लेखन की चुनौतियों या मीडिया के क्षेत्र में पूंजीवादी व्यवसाय की भीतरी परतों-उद्देश्यों को ही नहीं बताती है, बल्कि शब्द और अर्थ से जुड़ी शक्ति-संरचना को भी विस्तार से बताती है। हिंदी भाषा में प्रयुक्त होने वाले अनेक अशुद्ध शब्दों के जगह पर उनके शुद्ध प्रयोग को मार्गदर्शित भी करती है। यह कहानी भाषा के वैभव को भी सुदृढ़ करने हेतु एक मजबूत हस्तक्षेप की तरह है। 

कहानी में समकालीन भाषाई, सांस्कृतिक एवं सामाजिक चिंताओं तथा कई मुद्दों पर लगभग आपसी सहमति से युक्त भर्तृहरि को छोड़ कर बड़े जुनूनी युवा पात्र हैं, भैरवी, महाप्राण एवं दिङ्नाग साथ ही कुछ कलावादी सोच और कर्म से युक्त कुमारिल भट्ट, प्रभाकर मिश्र, मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र जैसे पात्र। दूसरी ओर समाज की सोच पर नियंत्रण वाले खतरनाक मंसूबों से लैस कारोबारी हैं, मकरंद मलानी और उसका बेटा श्रवण मलानी। मकरंद की बिटिया धनिष्ठा भी आरंभिक यात्रा में मलानी के ठग-व्यापार की मौन साथी होती है लेकिन वह आगे चलकर मकरंद मलानी से अलग ख़्याल को जीने लगती है।

खतरनाक इरादे इस रूप में कि मकरंद मलानी कुंभ मेले में एक नागा साधु बन चुके अपने पिता के एक बात को गुरुमंत्र मान कर अपने ठगी के कारोबार को बढ़ाता है। उस बात में उसके नागा साधु बन चुके उसने पिता ने कहा था, “कुछ ऐसा धन्धा करो जिससे आम जन के बोल-चाल में फ़र्क आ जाय।… जिसकी बोली में फ़र्क आ जायेगा, उसकी सोच में फ़र्क आ जायेगा। जिसकी सोच में फ़र्क आ जायेगा, वह बहकावे में आ जायेगा।” (पृष्ठ 79) इस कहानी में बात और सूत्रवाक्य की तरह है। जब महाप्राण कहता है, “मनुष्य को ‘जो है’ और ‘जो उसे होना चाहिये’ के बीच तनाव द्वारा परिभाषित किया जाना चाहिये।” (पृष्ठ 100) फिर इस बात पर भैरवी जो जिज्ञासा प्रकट करती है, वह जिज्ञासा ही इस दौर के समय को समझने और सुलझाने के सूत्र के रूप में है। महाप्राण के कथन के प्रति उत्तर में भैरवी की जिज्ञासा है, “जो है और जो होना चाहिये, इसके बीच कितनी दूरी है।” (पृष्ठ 100) सच तो यह है कि उसी दूरी को ज्ञात करने का जतन कर लिया जाय तो तमाम मसले ख़ुद ही हल हो जायेंगे।

न केवल दार्शनिक अवधारणाओं एवं भाषिक सिद्धांतों पर बहस बल्कि हिंदी भाषा और साहित्य की दुर्गति या कहें भाषा के साथ व्यभिचार की भी चिंता इस कहानी को उल्लेखनीय को बना देती है। कहानी का एक अंश देखा जाय, “हिन्दी साहित्य के पतन के लिये कौन जिम्मेदार है? अव्वल तो हिन्दी के ‘प्रबुद्ध’ साहित्यकार यह मानने को तैयार ही नहीं कि उनके साहित्य का भयावह पतन हुआ है। केवल पाठकों की संख्या घट जाने से वह साहित्य का पतन नहीं मानते। तर्क यह है कि पाठक पहले रेडियो के श्रोता बने, फिर टेलीविजन के दर्शक बने, फिर सोशल मीडिया के शिकार हुये। दूसरे हमारे भोले-भाले ग्राहकों को बहका के ले गये, इसमें हमारी क्या गलती है? गुणवत्ता में हम प्रेमचंद या जयशंकर प्रसाद से कम तो नहीं। हिन्दी में कितने पाब्लो नेरुदा, कितने देरिदा, कितने बोर्हेज छिपे हैं, कमबख्त मीडिया को कहाँ दिखता है?… हर साल भारत सरकार हर विश्वविद्यालय को शोध के लिये और अन्य क्रियाकलापों के लिये बहुत पैसा अनुदान में देती है। शोध का विषय हिन्दी कविता में लोटे का महत्त्व से ले कर फलाना साहब की साहित्य-कवित्व योजना कुछ भी हो सकती है। हमारे विश्वविद्यालय वहाँ से कॉल सेंटर में काम करने वाले लड़के, कूरियर के डिलीवरी बॉय तैयार करने में लगे रहते हैं। यह तो सत्य ही मान बैठे हैं कि हिन्दी वही पढ़ने आयेगा जो कुछ और पढ़ने लायक नहीं होगा। उसे कम्प्यूटर का, विज्ञान का सामान्य ज्ञान भी नहीं होगा। उन्हें प्रबुद्ध बनाने की दिशा में कोई कदम भी नहीं उठाया जायेगा।” (पृष्ठ 54-55)

इस कहानी में हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य और साहित्य समारोहों के नकली-चमकीले और अदृश्य आवरण को अनावृत्त कर देने की कोई कसर शेष नहीं दिखती। भाषा और साहित्य के पतन को लेकर कहानी का एक चैतन्य चरित्र दिङ्नाग ठीक ही कहता है, “हिन्दी के पतन का सर्वोत्तम प्रमाण चाहिये तो मीडिया और समाचार-पत्रों की भाषा देखनी चाहिये। जिस पर न तो साहित्य का प्रभाव है, न तो हिन्दी के प्राध्यापकों का। वह हर तरह की आलोचना से मुक्त हैं और भ्रष्ट हैं। वह न केवल भाषा का पतन है, बल्कि विचारों का, सौम्यता और शिष्टता का भी पतन है। जिस दौर में सारा जोर भोगवाद और स्वार्थ सिद्धि में लगा हो, वहाँ तथाकथित साहित्य कूड़ा होने के कारण आलोच्य भी नहीं रह जाता।” (पृष्ठ 57)

हिंदी व्याकरण में लिङ्ग निर्धारण तथा अनुनासिक एवं अनुस्वार आदि के प्रयोग को लेकर दिङ्नाग की चिंता जायज़ है। वह कहता है, “हिन्दी का व्याकरण बनाते हुए लिङ्ग पर ठीक से विचार नहीं किया गया। हिन्दी में सभी पदाथों को सचेतन मान लिया जाता है। इसलिये हिन्दी में लिङ्ग का निर्धारण करना कठिन हो जाता है। इसके व्यापक नियम नहीं बनते इसलिये भाषा का निश्चित व्यापार नहीं बन पाता। इसलिये पवन, चर्चा, जान जैसे शब्द कभी पुल्लिङ्ग, कभी स्त्रीलिङ्ग होते रहते हैं।”… हमने प्राकृत भाषा की परम्परा से अनुस्वार और अनुनासिक वर्ण अपना लिये हैं जिसे बिन्दु (ं) और चन्द्रबिन्दु (ॅं) से दिखाते हैं। इसके प्रयोग को ठीक से नहीं समझने से कितनी परेशानियाँ होती हैं। अब अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर समाप्त करने की होड़ लगी है।” (पृष्ठ 108-109)

दरअसल, मकर कहानी कई मायनों में कहानी के प्रचलित शिल्प को तोड़ती है। पृष्ठ संख्या के लिहाज़ से भी। कहानी को ले कर कहा गया है कि छोटी मुँह बड़ी बात, लेकिन इस कहानी का मुँह भी बड़ा है और कहानी भी। यह कहानी 199 पृष्ठों की है। इस कहानी में केवल कहानी कहने भर के लिए ही कहानी नहीं है। कहानी के भाषिक शिल्प में आरम्भ से अंत तक बहुत कम ही जगह सरसता है। बहुत कम पृष्ठों पर ही भाषाई सहजता है। बल्कि इस कहानी में मूल कहानी के विषयवस्तु से इतर कथा पात्रों द्वारा जटिल दार्शनिक अवधारणाओं पर बहस है। अपोवाह सिद्धांत, शब्द और अर्थ के सैद्धांतिक आयामों तथा भाषा के व्याकरणिक त्रुटियों पर सुचिंतित संवाद को इस कहानी में दर्ज़ किया गया है। 

यह कहानी भौतिक काम्य वस्तुओं की ‘जिजीविषा’ और ‘सुखेषणा’ से संचालित मूल्यों के बरक्स शिक्षा, न्याय और संघर्षपरक मूल्यों की महत्ता को स्थापित करने की पुरजोर कोशिश करती है। वैसे तो इस कहानी में कई महत्त्वपूर्ण सूत्र वाक्य हैं, लेकिन एक वाक्य इस दौर के यथार्थ की तरह प्रयुक्त हुआ, “जिसको भाषा, शब्द और अर्थ की शक्ति का ज्ञान होता है, वही सबसे अधिक शक्तिशाली होता है।” (पृष्ठ 89) ख़ैर, अंत तक आते-आते यह कहानी हिंदी भाषा के व्याकरण और साहित्य तथा समकालीन शक्ति संरचनाओं के धूल, धुएं और गुबार में मीठी सी तासीर भी घोल जाती है। कहानी से गुजरते हुए लगता है कि सचेत युवाओं की टोली कला, संस्कृति, ज्ञान, भाषा, व्याकरण एवं धर्म आदि से जुड़ी हुई अनेक साजिशों को बेनकाब कर सकती है। अभी बहुत कुछ अनहोनियाँ टाल सकती है।

मकर के अलावा इस संग्रह में पाँच और कहानियाँ हैं, ‘कुम्भ’, ‘मीन’, ‘मेष’, ‘वृष: सिटी लाइट्स’ और ‘मिथुन’। ‘कुम्भ’ कहानी का नायक विपिन कुमार ‘कुम्भकार’ अपने विद्यार्थी जीवन के आरम्भिक दिनों में एक असफल युवा के तौर पर देखा जाता है, इसलिए कि उसकी गरीबी, उसकी क्षीण काया और अंग्रेजी भाषा उसके लिए उसकी कमजोरी की तरह थी। आधुनिक जीवन शैली को न जी पाने और अपने विरुद्ध उपहास या मज़ाक के लिए मानो अभिशप्त था। वह चाह कर भी इससे बाहर नहीं निकल पाता है, भरसक भरपूर आलस्य, प्रमाद और नशे में डूब जाता है। वह धीरे-धीरे अपने एक मित्र के सकारात्मक एवं ऊर्जावान विचारों से प्रभावित होता है। एक दिन भीतर की अदम्य इच्छाशक्ति से अपने को स्थापित करता है। विपिन ठीक ही कहता है, “सभी लोग किसी न किसी शक्ति से कुछ कर रहे हैं। उनका चलना, बोलना, काम करना जितनी चीजें मैं गिन लूँ, जितनी चीजों का नाम ले लें वे सब शक्ति के परिणाम ही हैं। मैं समझ गया कि आदमी के अन्दर सारी शक्ति उसकी अदम्य इच्छाशक्ति से आती है।” (पृष्ठ 231)

‘मीन’ कहानी दो किशोर युवतियों वीणा, मैत्रेयी और घर से भागे हुए किशोर लेकिन उन सबके साहसी भाई दिलीप तथा जजकोठी के रईस खानदान की वृद्ध रेवती सिन्हा के ज़रिए उत्तर भारतीय परिवारों में लैंगिक भेद और उसकी सीमाओं को परिभाषित करती है। यह कि लड़कियों की आज़ादी कैसे पानी की एक निश्चित सीमा के भीतर तैरती मछलियों की तरह होती है। जब घर से भागा हुआ दिलीप वापस लौटता है तो उसकी बहन वीणा कहती है, “पापा तुमको पीटते नहीं हैं। अकेला लड़का होने का तुमको फायदा मिलता है। लड़के हो इसलिये भाग भी गये। हम दोनों को गुस्सा भी आये तो कुछ नहीं कर सकते हैं। तुमको पीट भी नहीं सकते हैं।” (पृष्ठ 244)

‘मेष’ कहानी में प्रेम, विभ्रम और विक्षिप्तता से लिपटा हुआ एक भटकता हुआ युवा है। वह भटकाव ही उस युवा के जीवन-दर्शन एवं समझ को स्पष्ट, उज्ज्वल और दृश्यमान बना देते हैं। यह कहानी कई मायनों में बड़ी शानदार लगी। एक तो यह कि प्रेम में होना, उसे जीना और उसके अभाव में रहना कितना मोहक और मार्मिक होता है। दूर बहुत दूर होते जाते प्रेम को पा लेने का जुनूनी जतन अद्भुत एहसास से भर देता है। कहानी के युवा नायक के लिए महारानी का प्रेम दुनियावी रंग के एकदम पास लेकर आ जाता है। इस कहानी में भटकते प्रेमिल युवा के स्वप्न में प्रकट हुई अप्सराएं तिलोत्तमा, मेनका, उर्वशी एवं रम्भा तथा साक्षात् महादेव जीवन की बड़ी गूढ़ लेकिन सुंदर व्याख्याओं के साथ उपस्थित होते हैं। कहानी का बड़ा प्रेरक वाक्य है, “अभाव हर वस्तु का मूल्य समझा देता है।”

इस कहानी में जिस ‘मेष’ राशि का उल्लेख हुआ है, भारतीय खगोलशास्त्र में उसे पुरुष भेड़ के रूप में दर्शाया गया है। कहानी का अंतिम  परिच्छेद ही कहानी के मूल स्रोत की तरह है। वह परिच्छेद है, “आदमी भेड़ बन कर जीता रहता है, जो कभी अपनी वासना से, अपनी मूर्खता से, किसी की डाँट से, किसी की फटकार से, दिखने वाली कोई भी राह पकड़ लेता है। भेड़ को कोई भी हाँक सकता है। जादूगर भी भेड़ ही होता है। कुछ पलों के लिये उसे लगता है कि वह सबको हाँक रहा है, किन्तु वह भी हाँका जा रहा होता है, अभाव से, नियति से, मूर्खता से। भेड़ों को हाँक जाने का अफसोस नहीं होता, जैसे जादूगरों को जादूगर बनने में अफसोस नहीं होता। मैं चाहता तो यही था कि महारानी मुझे हाँक कर अपने बाड़े में ले जाय। यही तो आशिक़ की गति होनी चाहिये।”

‘वृष: सिटी लाइट्स’ एक ऐसी कहानी है, जिसमें दो युवा दोस्तों के बीच सिनेमा की दुनिया की कुछ बड़ी बेजोड़ फ़िल्मों की दास्तानगोई है। इस कहानी में न केवल इस दौर के कुछ संवादधर्मी युवाओं की अभिव्यक्ति है बल्कि मूक और श्वेत-श्याम सिनेमा के संवादों और उनके उपयोगिता पर सार्थक बहसें भी दर्ज़ हैं। कहानी का मुख्य युवा पात्र ‘व्योम’ सिनेमा जगत में एक ख़ास उपलब्धि की तरह चर्चित रही चार्ली चैप्लिन के मूक फिल्म ‘सिटी लाइट्स’ की तुलना ग्रिफिथ की ‘बर्थ ऑफ अ नेशन’ तथा आइजेन्सटीन की ‘बैटलशिप पोत्योम्किन’, दाव्जेनको की ‘अर्थ’ से करता है। कमाल अमरोही की ‘महल’ के कई संवादों को अपनी स्मृति का हिस्सा बना लेता है। सत्यजीत राय की सौ बार से अधिक देखी हुई डे-सीका की इतावली फ़िल्म ‘बाइसिकिल थीव्स’ पर चर्चा करता है। ख़ैर, कहानी की जो मूल कथा है, वह यह कि युवा व्योम कॉलेज के दिनों से निकलकर एक साधारण सी नौकरी कर लेता है। उसके लिए लंबी पढ़ाई और डिग्री का कोई औचित्य नहीं होता। वह दृढ़ इच्छा शक्ति, साहस, परिश्रम और कुछ अच्छी किताबों को ही पर्याप्त मानता है। आगे चल कर वह क्लासिक यानी कालजयी सिनेमा को जुनूनी हद तक पसंद करने लगता है। व्योम का दोस्त जिस रोहिणी से विवाह करता है, उस रोहिणी और व्योम के बीच प्रेमिल रिश्ते थे, सिटी लाइट्स फिल्म के नायक की तरह वाली परिस्थितियों से ही वह दोनों अलग हो जाते हैं। रोहिणी के शादी के मंच पर व्योम बोलता है, “मैं बहुत भागा, बहुत भागा, लेकिन अच्छा हुआ कि तक़दीर जो बड़ी से बड़ी ठोकर मुझे लगा सकती थी, लगा चुकी। यकीनन ये आख़िरी कुर्बानी थी, जिसके बाद इंसान के पास कुछ नहीं रह जाता।” व्योम का यही कथन इस कहानी के मर्म को छूती है। हालाॅंकि, व्योम का दोस्त जब कहता है, “अमीर आदमी का दुःख कोई नहीं देखता। वैसे अमीर आदमी किसी को सांड से अधिक कभी नजर नहीं आता। सांड का दुःख कौन देखेगा?” यह बात भी सिक्के के दूसरे पहलू की ही तरह समझे जाने की माँग करती है।

‘मिथुन’ कहानी की यात्रा को समझने के लिए कथाकार का यह कथन गौरतलब है, “मिथुन या जेमिनाई तारामण्डल राशिचक्र का एक तारामण्डल है। मिथुन राशि के पुनर्वसु नक्षत्र में दो तारे हैं। प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में जुड़वाँ या युगल के रूप में इसकी कल्पना की गयी है। इन तारों के यूनानी नाम हैं – कैस्टर और पोलक्स। ये दोनों ज्यूपिटर और लेडा के पुत्र थे। ये दोनों अजेय योद्धा और अभिन्न साथी थे, इसलिये इनके पिता ज्यूपिटर (यानी बृहस्पति) ने इन्हें आकाश में एक-दूसरे के समीप स्थापित कर दिया था। ये दोनों अभिन्नता के प्रतीक माने जाते हैं।” इस नामराशि वाली कहानी में दो भिन्न परिस्थितियों वाले दोस्तों संजय और उदय की दोस्ती केंद्र में है। संजय एक संघर्षशील परिवार के किशोर लोहार का बेटा है, वहीं उदय एक संभ्रांत और सम्पन्न परिवार का बालक है। संजय की ख़्वाहिश रईस खानदानों के लड़कों की तरह अपना केक काट कर जन्मदिन मनाना और कार में घूमना था तो उदय शहरी जीवन से उकताकर ठेठ देहाती जीवन को पसंद करने लगता है। दोनों की जातीय और आर्थिक परिस्थितियाँ एकदम अलग थीं। यद्यपि कि दोनों की इच्छित तीव्रता में एक और बड़ा अंतर था। संजय की ख़्वाहिश वैकल्पिक नहीं अनिवार्य मनःस्थिति थी और उदय की इच्छा एक हद तक ही ज़रूरी थी। भरसक वैकल्पिक ही। यह अंतर कहानी के अंत में प्रकट भी होता है। शायद तभी तो संजय जब उदय के घर से उपेक्षित हो कर लौटता है तो उसे अपनी बहन संगीता की बातें उसे याद आती है, “अमीर लोग ऐसे ही होते हैं। आज पूछ लिया है। कल शायद न पहचाने।” (पृष्ठ 294) यद्यपि कि कहानी के आख़िर में मिथुन राशि के दो तारों की तरह उदय और संजय मिल ही जाते हैं।

प्रचण्ड प्रवीर के इस संग्रह की कहानियों की बुनावट में मौजूद हैं, वह विवरण, वह दृश्य, वह रंग जो उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार में हमारी आँखों से ओझल हो रहें हैं। मसलन, मकर कहानी का यह दृश्य विवरण देखिए, “वही चेहरे, वैसे ही जवान, वही बचपन के संगी-साथी, वही मैदान, वही दरख्त, वहीं धूप-छाँव, वही रेडियो, वही मीडियम वेव, शॉर्ट वेव पर धीमा बजता हुआ सङ्गीत, वही पान की दुकान, वही कुआँ, वही बादल, धुआँ, वही टूटी-फूटी सड़कें, वही लकड़ी के सड़ते-सीले दरवाजे, वही धूल, वही आँधी, वही शोर, वही तमाशा, वही कागज के रंगीन तिकोने टुकड़ों को जूट की रस्सियों पर भात से चिपका कर विद्यालय के आँगन को सजाना, वही पोखर, वही पुराना खण्डहर… लेकिन इनमें से एक भी चीज न मिली। (पृष्ठ 17) ‘मीन’ कहानी का दिलीप जब घर छोड़ता है तो उसे दिखाई देता है, “रास्ते में उसे सियार दिखे। पुराना कुआँ दिखा। बन्द पड़ी रेल लाइन दिखी। सड़क के किनारे कैक्टस की झाड़ी, गूलर का सूखा पेड़ा, अमलतास की छाँव, मरा हुआ भैंसा, जला हुआ टायर, टीन के बर्तन, नुकीले पत्थर, पीली पड़ गयीं हड्डियाँ टूटी हुई बोतलें, पुरानी चप्पल, फटे कपड़े, पुरानी गुड़िया, फूटी गेंद, काली काई लगी खपरैल और न जाने क्या-क्या मिलते जा रहे थे।” (पृष्ठ 236)

वैसे तो इस समूचे कहानी संग्रह में हिंदी भाषी इलाके के विविध आयामों मसलन हिंदी भाषा, उसका व्याकरण, उसका साहित्य, दर्शन, प्रेम, पूंजीवादी बाज़ार, जीवन शैली, शक्ति संस्थान, धर्म, संस्कृति, कला, आर्थिक तंगी, शक्तिमानों के तिकड़म, बदलाव, बेचैनी आदि की बड़ी गहन पड़ताल है, लेकिन कहानियों की कथावस्तुओं के इतर इसमें तमाम जगहों पर लगभग भुला दिए गए या कहें विस्मृत वस्तुजगत के तमाम सूक्ष्म विवरण भी दर्ज़ हैं। इस कहानी संग्रह के शीर्षक के संबंध में भीष्म पितामह का एक प्रसंग उल्लेखनीय है। महाभारत के अनुसार, इच्छामृत्यु का वरदान पाने वाले भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण काल के आने की ही प्रतीक्षा की थी। पौराणिक मान्यता है कि इस पवित्र काल में शरीर का त्याग करने से आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन, इस संग्रह के कथा-नायक (खलनायक नहीं) मोक्ष की प्राप्ति के लिए किसी उत्तरायण की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने मजबूत इरादों, अद्भुत साहस एवं संघर्ष के बूते शब्द-संरचना और शक्ति-संरचना की जटिलताओं को समझने और सुलझाने के लिए जद्दोजहद करते हैं।

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