डूबते स्वर | भारतीय संस्कृति में लोक संगीत
किसी भी देश और सभ्यता-संस्कृति की आत्मा वहाँ की देशज और ग्रामीण, कस्बाई-दुनिया होती है। महानगरों के बरक्स इन जनपदों में लोक के ऐसे बहुमूल्य रत्न छिपे होते हैं, जिन्हें देखने-समझने के लिए एक पारखी दृष्टि की आवश्यकता होती है। ऐसे ही रत्नों में लोक-गीत और लोक-संगीत को रखा जा सकता है। आश्चर्य और चिंता का विषय यह है कि यह प्राय: श्रुत साहित्य है— आज भी लोक-गीतों का बहुलांश असंकलित और अप्रकाशित है। इनका संकलन-संपादन एक शोधपरक, श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण कार्य है। समय-समय पर इस दिशा में छुटपुट कार्य हुए हैं जो सराहनीय हैं। इस बार इस अनथक कार्य को सम्पन्न किया है रामदुलारी शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘डूबते स्वर’ में। यह पुस्तक वर्षों की उनकी मेहनत का फल है। दुर्भाग्य और विडंबना यह है कि बाज़ारवाद और सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के इस दौर में इन लोकगीतों को गाये जाने वाले स्वर डूब रहे हैं— लोक-गीत भुलाए जा रहे हैं। नष्ट होती भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल पक्षों को बचाना आज रचनाकार और उसकी कलम का प्रधान दायित्व है। इस किताब में रामदुलारी शर्मा ने इस दायित्व को बख़ूबी निभाया है। यहाँ वसंत ऋतु, वर्षा ऋतु में गाये जाने वाले लोकगीतों से लेकर विवाह संस्कार,जन्मोत्सव गीत, तथा तीर्थयात्रा गीत तक संकलित हैं। इन गीतों के बहाने इस पुस्तक में लोक-संगीत, लोक-संस्कृति और लोक-जीवन की ऐसी-ऐसी बारीकियों का उल्लेख है कि हैरान रह जाना पड़ता है। कुल मिलाकर एक संग्रहणीय किताब। आशा है कि हिन्दी समाज में इसे भरपूर मान मिलेगा।
— एकान्त श्रीवास्तव, दिल्ली
Author : Ramdulari Sharma
ISBN : 978-81-69009-35-5
Language : Hindi
Edition : First
Binding : Paperback
Pages : 150
Year : 2026
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